श्री सत्यनारायण कथा – Satyanarayan Katha – Satyanarayan Katha in Hindi- Satyanarayana Pooja – Shri Satyanarayan Katha

सत्यनारायण देव जी की विधिअनुसार पूजन भगवन नारायण देव जी की असीम कृपा पाने के लिए की जाती है |  श्री सत्यनारायण व्रत का पूजन जिस जिसने भी किया उसकी सभी मंगल कामनाये पुरी हुई हैं| इस पूजा का कोई निश्चित समय नही है, आप कभी भी सुबह या शाम को कर सकते हैं | पूर्णिमा या पूनम की दिन इस सत्यनारायण देव जी का पूजन अत्यधिक प्रभावकारी होता है|  कई श्रद्धालु इस दिन व्रत रखते हैं और कुछ पूजन करने तक व्रत रखते हैं |

आपके लिए मैंने सतनारायण व्रत कथा लेके आई हूँ ताकि आप बिना किसी परेशानी के बस मेरे पोस्ट खोल कर श्री सत्यनारायण व्रत कथा पढ़ सकते हैं| इसके कुल मिलके  पञ्च अध्याय है |

satynarayan vrat katha

श्री सत्यनारायण देव जी की कथा के लिए आवश्यक पूजन सामग्री-

  1. भगवान सत्यनारायण की तस्वीर
  2. चौकी
  3. केशर
  4. बन्दनवार,
  5. आम के पत्ते
  6. केले के खम्भे
  7. पञ्चपल्लव
  8. कलश
  9. पञ्चरत्न
  10. चावल
  11. नैवेद्य या नारियल
  12.  दीप
  13. धूप
  14. फूलो की  माला
  15. गुलाब के फूल
  16. तुलसी दल
  17. ऋतुफल
  18. श्रीफल
  19. पान
  20. अङ्ग वस्त्र
  21. कलावा
  22. वस्त्र
  23. यज्ञोपवीत
  24. पञ्चामृत (दही, दूध, शक्कर,शहद,तुलसी )

 

श्री सत्यनारायण व्रत की पूजन विधि 

यह व्रत पूर्णिमा की दिन संध्याकाल के समय की जाती है| स्नान अदि और सभी कर्मो से निवृत होक पूजा स्थान पर बीते और बड़ी ही श्रधा और मन से  श्री गणेश, गौरी,वरुण,  विष्णु आदि समस्त देवतागण को याद करके पूजा करे|  पूजा करने से पहले यह निश्चय करे की आप  सत्यनारायण देव जी का  पूजा हमेशा पूरी श्रधा से करेंगे | फिर अपने हाथो में फूल लेकर भगवन का स्मरण करे और यज्ञोपवीत, धूप, पुष्प, नैवेद्य आदि अर्पण करे और मन से उनसे  प्रार्थना करे – “हे भगवन! मैंने श्रद्धा से जल,फल आदि सभी सामग्रीयां अर्पण की है, इसे स्वीकार करे। मेरा आपको शत शत प्रणाम है। “इसके बाद सत्यनारायण देव जी  कथा  आरम्भ करे।

श्री सत्यनारायण व्रत कथा – प्रथम अध्याय 

महामुनि ऋषि व्यास जी ने कहा- बहुत समय पहले नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादिक अट्ठासी हजार ऋषियों ने पुराणवेत्ता श्री सूतजी से पूछा- हे सूतजी! इस कलियुग में वेद-विद्या-रहित मानवों को ईश्वर भक्ति किस प्रकार मिलेगी तथा उनका उद्धार कैसे होगा? हे मुनिश्रेष्ठ! कोई ऐसा व्रत अथवा तप बताइये जिसके करने से थोड़े ही समय में पुण्य प्राप्त हो तथा मनोवाञ्छित फल भी मिले। ऐसी कथा सुनने की हमारी बहुत इच्छा है।

इस प्रश्न पर शास्त्रों के ज्ञाता श्री सूतजी ने कहा- हे वैष्णवों में पूज्य! आप सभी ने प्राणियों के हित एवम् कल्याण की बात पूछी है। अब मैं उस श्रेष्ठ व्रत को आप लोगों से कहूँगा जिसे श्रेष्ठमुनि नारद जी ने श्री लक्ष्मीनारायण भगवान से पूछा था और श्री लक्ष्मीनारायण भगवान ने मुनिश्रेष्ठ नारद जी को बताया था। आप सभी श्रेष्ठगण यह कथा ध्यान से सुनें-

मुनिनाथ सुनो यह सत्यकथा सब कालहि होय महासुखदायी।
ताप हरे, भव दूर करे, सब काज सरे सुख की अधिकाई॥
अति संकट में दुःख दूर करै सब ठौर कुठौर में होत सहाई।
प्रभु नाम चरित गुणगान किए बिन कैसे महाकलि पाप नसाई॥

मुनिश्रेष्ठ नारद दूसरों के कल्याण हेतु सभी लोकों में घूमते हुए एक समय मृत्युलोक में आ पहुँचे। यहाँ बहुत सी योनियों में जन्मे प्रायः सभी मनुष्यों को अपने कर्मानुसार अनेक कष्टों से पीड़ित देखकर उन्होंने विचार किया कि किस यत्न् के करने से निश्चय ही प्राणियों के कष्टों का निवारण हो सकेगा। मन में ऐसा विचार कर श्री नारद विष्णुलोक गए।

वहाँ श्‍वेतवर्ण और चार भुजाओं वाले देवों के ईश नारायण को, जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे तथा वरमाला पहने हुए थे, को देखकर उनकी स्तुति करने लगे। नारदजी ने कहा- हे भगवन्! आप अत्यन्त शक्तिवान हैं, मन तथा वाणी भी आपको नहीं पा सकती, आपका आदि-मध्य-अन्त भी नहीं है। आप निर्गुण स्वरूप सृष्टि के कारण भक्तों के कष्टों को नष्ट करने वाले हो। आपको मेरा शत शत नमन है।

नारदजी से इस प्रकार की प्रार्थना सुनकर विष्णु भगवान बोले- हे योगिराज! आपके मन में क्या है? आपका किस कार्य हेतु यहाँ आगमन हुआ है? निःसंकोच कहें।

तब मुनिश्रेष्ठ नारद मुनि ने कहा- मृत्युलोक में सब मनुष्य, जो अनेक योनियों में पैदा हुए हैं, अपने-अपने कर्मों द्वारा अनेक प्रकार के कष्टों के कारण दुःखी हैं। हे स्वामी! यदि आप मुझ पर दया रखते हैं तो बताइए कि उन मनुष्यों के सब कष्ट थोड़े से ही प्रयत्‍न से किस प्रकार दूर हो सकते हैं।

श्री विष्णु भगवान ने कहा- हे नारद! मनुष्यों की भलाई के लिए तुमने यह बहुत उत्तम प्रश्न किया है। जिस व्रत के करने से मनुष्य मोह से छूट जाता है, वह व्रत मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो, अति पुण्य दान करने वाला, स्वर्ग तथा मृत्युलोक दोनो में दुर्लभ, एक अति उत्तम व्रत है जो आज मैं तुमसे कहता हूँ। श्री सत्यनारायण भगवान का यह व्रत विधि-विधानपूर्वक सम्पन्न करने पर मनुष्य इस धरती पर सभी प्रकार के सुख भोगकर, मरणोपरान्त मोक्ष को प्राप्त होता है। श्री विष्णु भगवान के ऐसे वचन सुनकर नारद मुनि बोले- हे भगवन्! उस व्रत का विधान क्या है? फल क्या है? इससे पूर्व किसने यह व्रत किया है और किस दिन यह व्रत करना चाहिये? कृपया मुझे विस्तार से समझाएं।

श्री विष्णु भगवान ने कहा- हे नारद! दुःख-शोक एवम् सभी प्रकार की व्याधियों को दूर करने वाला यह व्रत सब स्थानों पर विजय दिलाने वाला है। श्रद्धा और भक्ति के साथ किसी भी दिन, मनुष्य सन्ध्या के समय श्री सत्यनारायण भगवान की ब्राह्मणों और बन्धुओं के साथ पूजा करे। भक्तिभाव से नैवेद्य, केले का फल, नैवेद्य, घी, शहद, शक्कर अथवा गुड़, दूध और गेहूँ का आटा सवाया लेवे (गेहूँ के अभाव में साठी का चूर्ण भी ले सकते हैं)। इन सभी को भक्तिभाव से भगवान श्री सत्यनारायण को अर्पण करे। बन्धु-बान्धवों सहित ब्राह्मणों को भोजन कराए। इसके पश्‍चात् ही स्वयम् भोजन करे। रात्रि में श्री सत्यनारायण भगवान के गीत आदि का आयोजन कर श्री सत्यनारायण भगवान का स्मरण करते हुए समय व्यतीत करे। इस तरह जो मनुष्य व्रत करेंगे, उनकी मनोकामनायें अवश्य ही पूर्ण होंगी। विशेषरूप से कलियुग में, मृत्युलोक में यही एक ऐसा उपाय है, जिससे अल्प समय और कम धन में महान पुण्य की प्राप्ति हो सकती है।

॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा प्रथम अध्याय सम्पूर्ण ॥


श्री सत्यनारायण व्रत कथा – द्वितीय अध्याय

महान सन्त सूतजी ने कहा- हे ऋषियों! जिन्होंने प्राचीन काल में इस व्रत को किया है, उनका इतिहास मैं आप सब से कहता हूँ- ध्यान से सुनें । अति सुन्दर काशीपुर नगरी में एक अति निर्धन ब्राह्मण वास करता था । वह भूख और प्यास से बेचैन होकर हर समय दुःखी रहता था। ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले श्री विष्णु भगवान ने उसको दुखी देखकर एक दिन बूढ़े ब्राह्मण का वेश धारण कर निर्धन ब्राह्मण के पास जाकर बड़े आदर से पूछा- हे ब्राह्मण! तुम हर समय ही दुखी होकर पृथ्वी पर क्यों घूमते हो? हे श्रेष्ठ ब्राह्मण अपनी व्यथा मुझसे कहो, मैं सुनना चाहता हूँ। कष्टों से घिरे उस ब्राह्मण ने कहा- मैं निर्धन ब्राह्मण हूँ, भिक्षा के लिए पृथ्वी पर मारा-मारा फिरता हूँ। हे भगवन! यदि आप इससे मुक्ति पाने का कोई उपाय जानते हों तो कृपा कर मुझे बताएं।

वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किए हुए श्री विष्णु भगवान तब बोले- हे ब्राह्मण! श्री सत्यनारायण भगवान मनोवाञ्छित फल देने वाले हैं, इसलिए तुम उनका विधिपूर्वक पूजन करो, जिसके करने से मनुष्य सब दुखों से मुक्त हो जाता है। दरिद्र ब्राह्मण को व्रत का सम्पूर्ण विधान बतलाकर बूढ़े ब्राह्मण का रूप धरे श्री सत्यनारायण भगवान अन्तर्ध्यान हो गए।

वृद्ध ब्राह्मण ने जिस व्रत को बतलाया है, मैं उसको अवश्य विधि-विधान सहित करूँगा, ऐसा निश्‍चय कर वह दरिद्र ब्राह्मण घर चला गया। परन्तु उस रात ब्राह्मण को नींद नहीं आई।

अगले दिन वह जल्दी उठा और श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करने का निश्‍चय कर भिक्षा माँगने के लिए चल दिया। उस दिन उसको भिक्षा में अधिक धन मिला, जिससे उसने पूजा का सब सामान खरीदा और घर आकर अपने बन्धु-बान्धवों के साथ विधिपूर्वक भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत किया। इसके करने से वह गरीब ब्राह्मण सब कष्टों से छूटकर अति धनवान हो गया। उस समय से वह ब्राह्मण हर मास व्रत करने लगा। सत्यनारायण भगवान के व्रत को जो शास्त्रविधि के अनुसार श्रद्धापूर्वक करेगा, वह सब कष्टों से छूटकर मोक्ष प्राप्त करेगा। जो भी मनुष्य श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करेगा, वह सब कष्टों से छूट जाएगा। इस तरह नारदजी से सत्यनारायण भगवान का कहा हुआ यह व्रत मैंने तुमसे कहा। हे श्रेष्ठ ब्राहमणों! अब आप और क्या सुनना चाहते हैं, मुझसे कहें?

तब ऋषियों ने कहा- हे मुनीश्वर! संसार में इस विप्र से सुनकर किस-किस ने इस व्रत को किया, हम सब सुनना चाहते हैं।

मुनियों से ऐसा सुनकर श्री सूतजी ने कहा- हे मुनिगण! जिस-जिस प्राणी ने इस व्रत को किया है, उन सबकी कथा सुनो। एक समय वह धनी ब्राह्मण बन्धु-बान्धवों के साथ शास्त्र विधि के अनुसार अपने घर पर श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत कर रहा था। उसी समय एक लकड़ी बेचने वाला बूढ़ा व्यक्ति वहाँ आया। उसने सिर पर रखा लकड़ियों का गट्ठर बाहर रख दिया और ब्राह्मण के मकान में चला गया। प्यास से बेचैन लकड़हारे ने विप्र को व्रत करते देखा। वह प्यास को भूल गया। उसने विप्र का अभिनन्दन किया और पूछा- हे ब्राह्मण! आप यह किसका पूजन कर रहे हैं? इस व्रत को करने से क्या फल मिलता है? कृपा कर मुझे बताएं!

तब उस ब्राह्मण ने कहा- सब इच्छाओं को पूर्ण करने वाला यह श्री सत्यनारायण भगवन का व्रत है। इनकी ही कृपा से मेरे यहाँ धन एवम् ऐश्वर्य का आगमन हुआ है। ब्राह्मण से इस व्रत के बारे में जानकर वह लकड़हारा अत्यन्त प्रसन्न हुआ। भगवान का चरणामृत लेकर और भोजन करने के पश्चात् वह अपने घर को चला गया।

और फिर अगले दिन लकड़हारे ने अपने मन में सङ्कल्प किया कि आज गाँव में लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा, उसी से भगवान सत्यनारायण का श्रेष्ठ व्रत करूँगा। मन में ऐसा विचार कर वह लकड़हारा लकड़ियों का गट्ठर अपने सिर पर रखकर जिस नगर में धनवान लोग रहते थे, ऐसे सुन्दर नगर में गया। उस दिन उसे उन लकड़ियों का दाम पहले दिनों से चौगुना मिला। तब वह बूढ़ा लकड़हारा बहुत प्रसन्न होकर पके केले, शक्कर, शहद घी, दूध, दही और गेहूँ का चूर्ण इत्यादि, श्री सत्यनारायण भगवान के व्रत की सभी सामग्री लेकर अपने घर आया। फिर उसने अपने बन्धु-बान्धवों को बुलाकर विधि-विधान के साथ भगवान का पूजन एवम् व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन-धान्य से युक्त हुआ और संसार के समस्त सुख भोगकर बैकुण्ठ को चला गया।

॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा द्वितीय अध्याय सम्पूर्ण ॥

श्री सत्यनारायण व्रत कथा – तृतीय अध्याय

श्री सूतजी बोले- हे श्रेष्ठ मुनियो! अब मैं आगे की एक कथा कहता हूँ। प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक महान ज्ञानी राजा था। वह जितेन्द्रिय और सत्यवक्ता था। प्रतिदिन मन्दिरों में जाता तथा गरीबों को धन देकर उनके दुःख दूर करता था। उसकी पत्‍नी कमल के समान सुन्दर मुख वाली और सती साध्वी थी। एक दिन भद्रशीला नदी के तट पर वे दोनों विधि विधान सहित श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत कर रहे थे। उस समय वहाँ साधु नामक एक वैश्य आया। उसके पास व्यापार के लिए बहुत-सा धन था। वह वैश्य नाव को नदी किनारे पर ठहराकर राजा के पास आया। राजा को व्रत करते हुए देखकर उसने विनम्रतापूर्वक पूछा- हे राजन! यह आप क्या कर रहे हैं? मेरी सुनने की इच्छा है। कृपया आप यह मुझे भी समझाइये। महाराज उल्कामुख ने कहा- हे साधु वैश्य! मैं अपने बन्धु-बान्धवों के साथ पुत्र की प्राप्ति के लिए श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत व पूजन कर रहा हूँ। राजा के वचन सुनकर साधु नामक वैश्य ने आदर से कहा- हे राजन! मुझे भी इसका सम्पूर्ण विधि विधान बताएं। मैं भी आपके कहे अनुसार इस व्रत को करूँगा। मेरी भी कोई सन्तान नहीं है। मुझे विश्वास है, इस उत्तम व्रत को करने से अवश्य ही मुझे भी सन्तान होगी।

राजा से व्रत के सब विधान सुन, व्यापार से निवृत्त हो, वह वैश्य सुखपूर्वक अपने घर आया। उसने अपनी पत्‍नी को सन्तान देने वाले उस व्रत के विषय में सुनाया और प्रण किया कि जब मेरे सन्तान होगी, तब मैं इस व्रत को करूँगा। वैश्य ने यह वचन अपनी पत्‍नी लीलावती से भी कहे। एक दिन उसकी पत्‍नी लीलावती श्री सत्यनारायण भगवान की कृपा से गर्भवती हो गई। दसवें महीने में उसने एक अति सुन्दर कन्या को जन्म दिया। दिनों-दिन वह कन्या इस तरह बढ़्ने लगी, जैसे शुक्लपक्ष का चन्द्रमा बढ़ता है। कन्या का नाम उन्होंने कलावती रखा। तब लीलावती ने मीठे शब्दों में अपने पति को याद दिलाया कि आपने जो भगवान का व्रत करने का सङ्कल्प किया था, अब आप उसे पूरा कीजिये। साधु वैश्य ने कहा- हे प्रिय! मैं कलावती के विवाह पर इस व्रत को करूँगा। इस प्रकार अपनी पत्‍नी को आश्वासन दे वह व्यापार करने विदेश चला गया।

कलावती पितृगृह में वृद्धि को प्राप्त हो गई। लौटने पर साधु ने जब नगर में सखियों के साथ अपनी वयस्क होती पुत्री को खेलते देखा तो उसे उसके विवाह की चिन्ता हुई, तब उसने एक दूत को बुलाकर कहा कि उसकी पुत्री के लिए कोई सुयोग्य वर देखकर लाए। दूत साधु नामक वैश्य की आज्ञा पाकर कन्चननगर पहुँचा और देख-भालकर वैश्य की कन्या के लिए एक सुयोग्य वणिक पुत्र ले आया। उस सुयोग्य लड़के के साथ साधू नमक वैश्य ने अपने बन्धु-बान्धवों सहित प्रसन्नचित्त होकर अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। दुर्भाग्य से वह विवाह के समय भी सत्यनारायण भगवान का व्रत करना भूल गया। इस पर श्री सत्यनारायण भगवान अत्यन्त क्रोधित हो गए। उन्होंने वैश्य को श्राप दिया कि तुम्हें दारुण दुःख प्राप्त होगा।

और फिर अपने कार्य में कुशल वह वैश्य अपने दामाद सहित नावों का बेड़ा लेकर व्यापार करने के लिए सागर के समीप स्थित रत्‍नसारपुर नगर में गया। रत्‍नसारपुर पर चन्द्रकेतु नामक राजा राज करता था। दोनों ससुर-जमाई चन्द्रकेतु राजा के उस नगर में व्यापार करने लगे। एक दिन भगवान सत्यनारायण की माया से प्रेरित एक चोर राजा चन्द्रकेतु का धन चुराकर भाग रहा था। राजा के दूतों को अपने पीछे तेजी से आते देखकर चोर ने घबराकर राजा के धन को वैश्य की नाव में चुपचाप रख दिया, जहाँ वे ससुर-जमाई ठहरे हुए थे और भाग गया। जब दूतों ने उस वैश्य के पास राजा के धन को रखा देखा तो उन्होंने उन ससुर-दामाद को ही चोर समझा। वे उन ससुर-दामाद दोनों को बाँधकर ले गए और राजा के समीप जाकर बोले- आपका धन चुराने वाले ये दो चोर हम पकड़कर लाए हैं, देखकर आज्ञा दें।

तब राजा ने बिना उस वैश्य की बात सुने उन्हे कारागार में डालने की आज्ञा दे दी। इस प्रकार राजा की आज्ञा से उनको कारावास में डाल दिया गया तथा उनका सारा धन भी छीन लिया गया। सत्यनारायण भगवान के श्राप के कारण उस वैश्य की पत्‍नी लीलावती व पुत्री कलावती भी घर पर बहुत दुःखी हुईं। उनका सारा धन चोर चुराकर ले गए। मानसिक व शारीरिक पीड़ा तथा भूख-प्यास से अति दुःखी हो भोजन की आस मे कलावती एक ब्राह्मण के घर गई। उसने ब्राह्मण को श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत विधिपूर्वक करते देखा। उसने कथा सुनी तथा श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण कर रात को घर आई। माता ने कलावती से पूछा- हे पुत्री! तू अब तक कहाँ रही, मैं तेरे लिए बहुत चिन्तित थी।

माता के शब्द सुन कलावती बोली- हे माता! मैंने एक ब्राह्मण के घर श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा है और मेरी भी उस उत्तम व्रत को करने की इच्छा है।

माता ने कन्या के वचन सुनकर सत्यनारायण भगवान के पूजन की तैयारी की। उसने बन्धुओं सहित श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन व व्रत किया और वर माँगा कि मेरे पति और दामाद शीघ्र ही घर लौट आएँ। साथ ही विनती की कि हे प्रभु! अगर हमसे कोई भूल हुई हो तो हम सबका अपराध क्षमा करो। श्री सत्यनारायण भगवान इस व्रत से प्रसन्न हो गए। उन्होंने राजा चन्द्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा – हे राजन! जिन दोनों वैश्यों को तुमने बन्दी बना रखा है, वे निर्दोष हैं, उन्हें प्रातः ही छोड़ दो। उनका सब धन जो तुमने अधिग्रहित किया है, लौटा दो, अन्यथा मैं तुम्हारा राज्य, धन, पुत्रादि सब नष्ट कर दूँगा। राजा से ऐसे वचन कहकर भगवान अन्तर्ध्यान हो गए।

और फिर प्रातः काल राजा चन्द्रकेतु ने दरबार में सबको अपना स्वप्न सुनाया और सैनिकों को आज्ञा दी कि दोनों वैश्यों को कैद से मुक्त कर दरबार में ले आयें। दोनों ने आते ही राजा को प्रणाम किया। राजा ने कोमल वचनों में कहा- हे महानुभावों! तुम्हें अज्ञानतावश ऐसा कठिन दुःख प्राप्त हुआ है। अब तुम्हें कोई भय नहीं है, तुम मुक्त हो। इसके बाद राजा ने उनको नये-नये वस्त्राभूषण पहनवाए तथा उनका जितना धन लिया था, उससे दुगना लौटाकर आदर से विदा किया। दोनों वैश्य अपने घर को चल दिये।

॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा तृतीय अध्याय सम्पूर्ण ॥

श्री सत्यनारायण व्रत कथा – चतुर्थ अध्याय

 

सूतजी ने आगे कहा- वैश्य ने यात्रा आरम्भ की और अपने नगर को चला। उनके थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर दण्डी वेषधारीश्री सत्यनारायण भगवान ने उसकी परीक्षा लेने हेतु उससे पूछा- हे वैश्य! तेरी नाव में क्या है? अभिमानि वणिक हँसता हुआ बोला- हे दण्डी! आप क्यों पूछते हैं? क्या धन लेने की कामना है? मेरी नाव में तो बेल के पत्ते भरे हैं।

वैश्य के ऐसे वचन सुनकर दण्डी वेशधारी श्री सत्यनारायण भगवान बोले- तुम्हारा वचन सत्य हो! ऐसा कहकर वे वहाँ से चले गए और कुछ दूर जाकर समुद्र के तट पर बैठ गए।

दण्डी महाराज के जाने के पश्‍चात वैश्य ने नित्य-क्रिया से निवृत्त होने के बाद नाव को ऊँची उठी देखकर अचम्भा किया तथा नाव में बेल-पत्ते आदि देखकर मूर्च्छित हो जमीन पर गिर पड़ा। मूर्च्छा खुलने पर अति शोक करने लगा। तब उसके दामाद ने कहा- आप शोक न करें। यह दण्डी महाराज का श्राप है, अतः हमें उनकी शरण में ही चलना चाहिये, वही हमारे दुःखों का अन्त करेंगे। दामाद के वचन सुनकर वह वैश्य दण्डी भगवान के पास पहुँचा और अत्यन्त भक्तिभाव से पश्चाताप करते हुए बोला- मैंने जो आपसे असत्य वचन कहे थे, उनके लिए मुझे क्षमा करें। ऐसा कहकर वह शोकातुर हो रोने लगा। तब दण्डी भगवान बोले- हे वणिक पुत्र! मेरी आज्ञा से ही बार-बार तुझे दुख कष्ट प्राप्त हुआ है, तू मेरी पूजा से विमुख हुआ है। तब उस वैश्य ने कहा- हे भगवन! आपकी माया को ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जान पाते, तब मैं मुर्ख भला कैसे जान सकता हूँ। आप प्रसन्न होइये, मैं अपनी क्षमता अनुसार आपकी पूजा करूँगा। मेरी रक्षा कीजिये और मेरी नौका को पहले के समान धन से परिपूर्ण कर दीजिये।

उसके भक्ति से परिपूर्ण वचन सुनकर श्री सत्यनारायण भगवान प्रसन्न हो गए और उसकी इच्छानुसार वर देकर अन्तर्ध्यान हो गए। तब ससुर व दामाद दोनों ने नाव पर आकर देखा कि नाव धन से परिपूर्ण है। फिर वह विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण का पूजन कर साथियों सहित अपने नगर को चला। जब वह अपने नगर के निकट पहुँचा तब उसने एक दूत को अपने घर भेजा। दूत ने साधु नामक वैश्य के घर जाकर उसकी पत्‍नी को नमस्कार किया और कहा- आपके पति अपने जमाता सहित इस नगर मे समीप आ गए हैं। लीलावती और उसकी कन्या कलावती उस समय भगवान का पूजन कर रही थीं। दूत का वचन सुनकर साधु की पत्‍नी ने बड़े हर्ष के साथ सत्यनारायण भगवान का पूजन पूर्ण किया और अपनी पुत्री से कहा- मैं अपने पति के दर्शन को जाती हूँ, तू पूजन पूर्ण कर शीघ्र आ जाना। परन्तु कलावती पूजन एवम् प्रसाद छोड़कर अपने पति के दर्शन के लिए चली गई।

पूजन एवम् प्रसाद की अवज्ञा के कारण भगवान सत्यनारायण ने रुष्ट हो, उसके पति को नाव सहित पानी में डुबो दिया। कलावती अपने पति को न पाकर रोती हुई जमीन पर गिर पड़ी। नौका को डूबा हुआ तथा कन्या को रोती हुई देख साधु नामक वैश्य द्रवित हो बोला- हे प्रभु! मुझसे या मेरे परिवार से अज्ञानतावश जो अपराध हुआ है, उसे क्षमा करें।

उसके ऐसे वचन सुनकर सत्यदेव भगवान प्रसन्न हो गए। आकाशवाणी हुई- हे वैश्य! तेरी पुत्री मेरा प्रसाद छोड़कर आई है, इसलिए इसका पति अदृश्य हुआ है। यदि वह घर जाकर प्रसाद ग्रहण कर लौटे तो इसे इसका पति अवश्य मिलेगा। आकाशवाणी सुनकर कलावती ने घर पहुँचकर प्रसाद ग्रहण किया और फिर आकर अपने पति को पूर्व रूप में पाकर वह अति प्रसन्न हुई तथा उसने अपने पति के दर्शन किये। तत्पश्‍चात साधु वैश्य ने वहीं बन्धु-बान्धवों सहित सत्यदेव का विधिपूर्वक पूजन किया। वह इस लोक के सभी प्रकार के सुख भोगकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त हुआ।

॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा चतुर्थ अध्याय सम्पूर्ण ॥


श्री सत्यनारायण व्रत कथा – पञ्चम अध्याय

श्री सूतजी बोले– हे ऋषिगण! मैं एक और कथा कहता हूँ, आप सभी ध्यान से सुनो- सदा प्रजा के लिए चिन्तिततुङ्गध्वज नाम का एक राजा था। उसने भगवान सत्यनारायण का प्रसाद त्यागकर बहुत कष्ट पाया। एक समय राजा वन में वन्य पशुओं को मारकर बड़ के वृक्ष के नीचे आया। वहाँ उसने ग्वालों को भक्ति-भाव से बन्धु-बान्धवों सहित श्री सत्यनारायणजी का पूजन करते देखा। परन्तु राजा देखकर भी अभिमान के कारण न तो वहाँ गया और न ही सत्यदेव भगवान को नमस्कार ही किया। जब ग्वालों ने भगवान का प्रसाद उसके सामने रखा तो वह प्रसाद छोड़कर अपने नगर को चला गया। नगर में पहुँचकर उसने देखा कि उसका सारा राज्य नष्ट हो गया है। वह समझ गया कि यह सब भगवान सत्यदेव ने रुष्ट होकर किया है। तब वह वन में वापस आया और ग्वालों के समीप जाकर विधिपूर्वक पूजन कर प्रसाद ग्रहण किया तो सत्यनारायण की कृपा से सब-कुछ पहले जैसा ही हो गया और लम्बे समय तक सुख भोगकर मरणोपरान्त वह मोक्ष को प्राप्त हुआ।

जो मनुष्य इस श्रेष्ठ दुर्लभ व्रत को करेगा, श्री सत्यनारायण भगवान की कृपा से उसे धन-धान्य की कोई कमी नहीं होगी। निर्धन धनी और बन्दी बन्धनों से मुक्त होकर निर्भय हो जाता है। सन्तानहीन को सन्तान प्राप्त होती है तथा सब इच्छाएँ पूर्ण कर अन्त में वह बैकुण्ठ धाम को जाता है।

अब उनके बारे में भी जानिए, जिन्होंने पहले इस व्रत को किया, अब उनके दूसरे जन्म की कथा भी सुनिये।

शतानन्द नामक वृद्ध ब्राह्मण ने सुदामा के रूप में जन्म लेकर श्रीकृष्ण की भक्ति एवम् सेवा कर बैकुण्ठ प्राप्त किया। उल्कामुख नामक महाराज, राजा दशरथ बने और श्री रङ्गनाथ का पूजन कर मोक्ष को प्राप्त हुए। साधु नाम के वैश्य ने धर्मात्मा व सत्यप्रतिज्ञ राजा मोरध्वज बनकर अपने पुत्र को आरे से चीरकर बैकुण्ठ धाम प्राप्त किया। महाराज तुङ्ग्ध्वज स्वयंभू मनु बने? उन्होंने बहुत से लोगों को भगवान की भक्ति में लीन कराकर बैकुण्ठ धाम प्राप्त किया। लकड़हारा अगले जन्म में गुह नामक निषाद राजा बना, जिसने राम के चरणों की सेवा कर अपने सभी जन्मों को सँवार लिया।

॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा पञ्चम अध्याय सम्पूर्ण ॥


फिर ॐ जय जगदीश हरे आरती गाए
फिर भगवान् को प्रसाद का भोग लगाये और सबसे  पहले कन्या को प्रसाद दे और उसके बाद सभी ग्रहण करे |
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